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 जौनपुर : यहाँ भी फेक एमडी, एमएस की डिग्री वाले डॉक्टर कर रहे इलाज़


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-एक चेन स्नेचर खुद डॉक्टर नहीं बन सका तो नईगंज में खोल लिया है इलाज़ की दुकान, दिनभर में सर्जरी का एक भी मरीज मिल गया तो इनका एक दिन का पूरा खर्च , स्टाफ का वेतन भी निकल जाता है l

-जौनपुर के स्वास्थ्य क्षेत्र में फर्जी डिग्री, नकली दवाएं, मानक के विपरीत आईसीयू, ओ.टी, अनट्रेंड्स स्टाफ और कुछ को छोड़कर तमाम बीमारियों के जाँच केंद्र' पैथालॉजी भी संदेह के दायरे में हैं l

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-कैलाश सिंह-

नई दिल्ली/लखनऊ/जौनपुर, (तहलका विशेष)l कहते हैं लोहा ही लोहा को काटता है l यह कहावत निजी अस्पतालों पर एकदम फिट बैठती है l इस रिपोर्ट में बानगी तो जौनपुर की है लेकिन ऐसी स्थिति उत्तर प्रदेश के कमोबेश सभी जिलों और अन्य राज्यों में मिलेगीl जिस तरह देशभर में केन्द्र सरकार ने आवागमन की सहूलियत के लिए सड़कों का जाल बिछाया तो आमजन में बढ़े रोजगार के साधन में खाद्य सामग्रियों वाले होटल, ढाबों और रेस्टोरेंट की भरमार हाईवे किनारे बढ़ गई l उसी तर्ज पर स्वास्थ्य व्यवसाय को लेकर भी जो क्रांति आई है उसके पीछे नकली दवाओं और बीमारियों की जाँच के लिए निजी अस्पतालों में ही खुले पैथालॉजी केन्द्र, मेडिकल स्टोर, ब्लडबैंक आदि की सन्दिग्ध भूमिका अहम है l इस व्यवसाय में बरसते रुपये को देख पढ़ाई में कम से कम 10 साल अपनी उम्र से बचाने के लिए 'काले धन' के मालिक 35 से 45 लाख रुपये खर्च करके 12 वीं पास अपने बच्चे को 'फेक डिग्री' दिला देते हैंl इसके बदले उन्हें 'वेल कवालीफाइड डॉक्टर बहू' भी मिल जाती है l इनकी अपेक्षा वह पुराने चिकित्सक भले हैं जो मेडिकल शिक्षण संस्थानों में डोनेशन के नाम पर करोड़ों खर्च करके कम से कम अपने बच्चों को पढ़ा तो देते हैं, यह दीगर है कि वह डॉक्टर बनकर मरीज को गंभीर बनाकर रेफर कर देते है, लेकिन उसे मारते तो नहीं हैं! 

पहले एपिशोड में हमने जिस फ़ेक डिग्री वाले डॉक्टर का जिक्र किया था वह जौनपुर शहर से गुजरे लुम्बिनी- दुद्धी मार्ग पर अपनी दुकान खोल लिया है l उसने बीएचयू से वेल कवालीफाइड महिला चिकित्सक से विवाह कर लिया तब जाकर शायद उसके नाम पर ही उपचार केन्द्र खोला है l इसको सबसे पहले उस कथित मशहूर चिकित्सक ने पकड़ा जिसने कोरोना काल को 'आपदा में अवसर' तलाशकर ख्याति अर्जित की थी l उसने अपने मल्टी स्पेशीयलिटी अस्पताल में फ़ेक डिग्री वाले को नौकरी दी थीl महीनों बाद जब उसकी डिग्री देखने को मांगी तो उसने दिखाने की बजाय नौकरी ही छोड़ दी l यहीं 'लोहे से लोहा' काटने की बात फिट बैठ गई l एक अन्य चिकित्सक ने उसके बताए राज्य के मेडिकल कौंसिल से 'आर टी आई' से सूचना मांगी तो वहाँ इसका जिक्र या जवाब नहीं मिला, फिर तो वह चिकित्साक इस मामले में पीछे ही पड़ गए l

इस बड़े स्कैम का खुलासा राजस्थान के प्रमुख मीडिया में होने लगा है l फ़ेक डिग्री वाले डॉक्टर ने बिहार के बड़े गिरोह (जो एम एमडी की फ़ेक डिग्री बेचते हैं) के सम्पर्क से झारखण्ड, आसाम, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु आदि में फैले नेटवर्क से बढ़ते हुए उसी नेटवर्क से डिग्री हासिल कीl यह नेटवर्क डिग्री देने के बाद अलग फ़ीस लेकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र समेत देश के तमाम राज्यों के मेडिकल कौंसिल में रजिस्ट्रेशन भी करा देता है ताकि डिग्री खरीदने वाले को सरकारी या प्राइवेट प्रैक्टिस में दिक्कत न हो, आगे आम आदमी की ज़िंदगी तो ऊपर वाला चला ही रहा है l हमारी रिपोर्ट में वहाँ के मीडिया की खबर भी शामिल हैl

जौनपुर में तो इसी स्कैम से जुड़ा एक डॉक्टर अन्य चिकित्सकों की नज़र में आ चुका है लेकिन प्रदेश के अन्य जिलों में भी ऐसे डॉक्टर होंगे तो हैरत नहीं होनी चाहिएl अब ऐसे फ़ेक डॉक्टर से तो वह 'चेन स्नेचर' ( पैसे के बल पर पुलिस रिकॉर्ड में नहीं आया) ही ठीक है जो अस्पताल खोलकर प्रशिक्षित चिकित्सक के जरिये मरीजों को लूट रहा हैl नईगंज के एक अन्य अस्पताल के चिकित्सक, संचालक ने 'हर मर्ज का शर्तिया इलाज' करने वाले अपने सीनियर चिकित्सक की पटरी पर चल रहा है l उसने पैतरा बदलकर हम जातीय पुलिस कर्मियों को ही प्रचार के लिए 'जिला स्तरीय ब्रांड एम्बेसडर' बना लिया है और अपने पिता को मेडिकल स्टोर पर बैठा दिया है l दवा की पर्ची कंप्यूटर या पैड की बजाय एक हस्त लिखित पर्ची पर देता है, जिसपर खुद की एमआरपी कराई गई दवा जो बाहर 12 रुपये की होती है वह उसके यहाँ 120 में पड़ती है l तीमारदार बेचारा 'मरता क्या न करता' की तरह निचुड़ती रकम के इंतज़ाम में लगा रहता है l 

यही हाल गोरखपुर- प्रयागराज फोर लेन पर सिपाह से लेकर मेडिकल हब नईगंज तक के दर्जनों अस्पतालों में है l अगली कड़ी में नकली दवाओं के खेल का विस्तार मिलेगा l बस यह जान लीजिए कि जिस तरह दुधियों, रेस्टोरेंट से खाद्य विभाग के लोग हर महीने औसतन दो हजार सुविधा शुल्क लेते हैं उसी तरह नकली दवाओं पर ड्रग इंस्पेक्टर रूपी मुनीम हफ़्ता लेते हैं, यही खेल अस्पतालों की पैथालॉजी केंद्रों में भी चलता हैl,,,,,, क्रमशः

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